मोतीलाल मेमोरियल सोसाइटी, लखनऊ
बहुमुखी प्रतिभा के धनी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं राजनीति के अमर पुरोधा तथा काकोरी ट्रेन एक्शन केस में क्रान्तिकारियों के पक्ष में अधिवक्ता के रूप में पैरवी करने वाले उ०प्र० के पूर्व मुख्यमंत्री श्रद्धेय श्री चन्द्रभानु गुप्त द्वारा समाजसेवा के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान के लिए सोसाइटी रजिस्ट्रेशन में प्रदत्त प्राविधानों के अन्तर्गत राजधानी लखनऊ में 08 मार्च, 1935 को "मोतीलाल मेमोरियल सोसाइटी" की स्थापना करायी गई थी। सोसाइटी का पंजीकृत कार्यालय मोतीमहल, 2–राणा प्रताप मार्ग, लखनऊ–226001 है।
मोतीलाल मेमोरियल सोसाइटी आज भी विभिन्न शिक्षण संस्थानों, चिकित्सालयों, संग्रहालयों एवं प्रेक्षागृह के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए शिक्षा, चिकित्सा एवं संस्कृति के प्रचार–प्रसार में अग्रणी भूमिका निभा रही है।
चन्द्रभानु गुप्त जी का संक्षिप्त इतिहास
चन्द्रभानु गुप्त जी का जन्म 14 जुलाई, 1902 को अलीगढ़ जिले के बिजौली ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री हीरालाल एवं माता का नाम श्रीमती कौशल्या देवी था। गुप्त जी ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा जिला लखीमपुर एवं उच्च शिक्षा (राजनीति शास्त्र में एम. ए. एवं एल.एल.बी.) लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की।
लखनऊ में नमक कानून तोड़ने के आन्दोलन का संचालन करने के कारण 14 अप्रैल, 1930 को लखनऊ के सिटी मजिस्ट्रेट ने जाब्ता फौजदारी की धारा–117 के अन्तर्गत श्री मोहन लाल सक्सेना एवं श्री चन्द्रभानु गुप्त जी को दण्डित किया जिसमें इन्हें डेढ़ साल की सजा मिली, बाद में अवध बार एसोसिएशन के अध्यक्ष जॉर्ज जैक्सन जो एक अंग्रेज थे, के व्यक्तिगत दिलचस्पी लेने और एसोसिएशन की ओर से दर्खास्त पर बहस करने के कारण उनकी सजा डेढ़ साल से घटाकर छः माह कर दी गयी। इस अवधि में कुछ समय तक लखनऊ की जेल में रखे जाने के बाद श्री चन्द्रभानु गुप्त जी को गाजीपुर जेल भेज दिया गया था जहाँ से वे रिहा हुए।
चन्द्रभानु गुप्त जी वर्ष 1937, 1946, 1952, 1961, 1962, 1967 व 1969 में उ०प्र० विधान सभा के सदस्य व 1960 से 1961 तक उ०प्र० विधान परिषद के सदस्य रहने के साथ ही साथ वर्ष 1947 से 1959 तक उ०प्र० सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के कैबिनेट मंत्री के पदों के दायित्वों का निर्वहन करते हुए 7 दिसम्बर, 1960 को प्रथम बार उ०प्र० के मुख्यमंत्री बने और 1970 तक चार बार मुख्यमंत्री के पद को सुशोभित किया और 11 मार्च, 1980 को उनका देहान्त हो गया।
चन्द्रभानु गुप्त जी की देश के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका रही है। वह एक सच्चरित्र, निष्ठावान, कुशल प्रशासक तथा दूरदर्शी नेता थे। वह नवीन विचारों एवं नई तकनीक को भौतिक सम्पत्ति से कहीं अधिक बड़ी सम्पत्ति मानते थे।चन्द्रभानु गुप्त जी ने अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व के माध्यम से अपना सम्पूर्ण जीवन देश व प्रदेश तथा समाज के लिए न्यौछावर कर दिया। श्री गुप्त जी एक महान देश भक्त, उच्चकोटि के राजनेता व समाजसेवी थे। उनके इस योगदान को देखते हुए भारत सरकार के डाक विभाग द्वारा इनकी स्मृति में वर्ष 2025 में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया।
मेरी वसीयत
मेरा सफर जो कभी रुका नहीं— झुका नहीं, न जाने कब अपनी मंज़िल प्राप्त कर ले और जीवन की संध्या छा जाय। मेरा जीवन एक भिखारी का जीवन रहा है। मेरे देश के विशेष रूप से इस प्रदेश के लोगों ने मुझे अपार स्नेह और सम्मान दिया है और मेरी झोली को अपने स्नेह दान से भरा है। उन सभी देशवासियों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु मैंने दो संस्थाओं "भारत सेवा संस्थान" तथा "मोतीलाल मेमोरियल सोसायटी" को जन्म दिया तथा अपने जीवन के आदर्शों और मूल्यों को उनमें निहित करने का प्रयास किया। यह दोनों संस्थायें मेरी कल्पना के अनुरूप उत्तरोत्तर विकसित होती रहें और देश की गरीब जनता की सेवा करते हुए विद्यार्थियों तथा युवा वर्ग को सही दिशा देकर उनका पथ प्रशस्त करती रहें, यही मेरी अभिलाषा है। राजनीति के क्षेत्र में कार्यरत होते हुए भी समाज सेवा के व्रत को निरन्तर निभाने में मैं प्रयत्नशील रहा हूँ और अन्तिम क्षणों तक रहूँगा। इन संस्थाओं के माध्यम से मैं अपने जीवन के विचारों और स्वप्नों को साकार करने में कहाँ तक सफल रहा हूँ, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। मैं देश का हूँ और देश मेरा है, मेरा सर्वस्व देश पर ही न्योछावर हो। मेरी जीवन लीला समाप्त होने के पश्चात भी उक्त दोनों संस्थायें, जिनमें मैंने समाज सेवा के उद्देश्यों और आदर्शों को संजोकर रखा है, ईमानदारी से अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहें, यही मेरी अभिलाषा है। मैं अपने सभी देशवासियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने संघर्ष के क्षणों में पग-पग पर मेरा साथ दिया है।
जो कुछ भी मेरा अपना कहने योग्य था वह सब "भारत सेवा संस्थान" एवं "मोतीलाल मेमोरियल सोसायटी" का हो चुका है। अब केवल एक मकान "सेवा कुटीर" स्थित पानदरीबा, शहर लखनऊ, जिला लखनऊ में मेरी निजी अचल सम्पत्ति के रूप में रह गया है, जिसका मैं एकमात्र स्वामी हूँ; यह भी देश की गरीब जनता को अर्पित है।
उत्तर प्रदेश, लखनऊ
